Articles by "संपादकीय"

रामभवन प्रजापति-हलियापुर |PrakashNewsOfIndia.in|
Last Updated: Thu, 13 Aug 2020; 09:37:00 PM

सुल्तानपुर/ हलियापुर: निरंतर बारिश के चलते कच्चे मकान के गिर जाने के कारण मलबे में दबकर पिता पुत्र की मौत हो गयी।जिसमें पत्नी व बेटी गंभीर रूप से घायल हो गई।जिनको इलाज के लिए जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया है।मिली जानकारी के अनुसार निरंतर बारिश के चलते बीती रात कच्चे मकान के गिर जाने के कारण मलबे में दबकर पिता रामअचल (55) वर्ष व राम हृदय (16) वर्ष की दर्द नाक मौत हो गई। जिसमें राम अचल की पत्नी बचाना देवी (50) वर्ष व पुत्री आरती (12) वर्ष गंभीर रूप से घायल हो गये।जिनका जिला अस्पताल में इलाज चल रहा है।हलियापुर थाना क्षेत्र के हलियापुर गांव की घटना।

शुभम तिवारी, सुलतानपुर |PrakashNewsOfIndia.in|
Last Updated: Sun, 02 Aug 2020; 09:35:00 AM


 सुलतानपुर: लगता है कोरोना पूरे जिले को अपनी जद में लेने की फिराक में है। हम ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि जिले में कोरोना का आंकड़ा धीरे- धीरे बढ़ता ही जा रहा है। लगभग हर-दिन कोरोना के नए मरीज सामने आते जा रहे हैं। हालांकि प्रशासन के आलाधिकारी भी मजबूती से काम करते हुए लगातार इन मरीजों की संख्या को शून्य पर पहुंचाने के लिए जी-जान से डटे हैं। जिले की सभी स्वास्थ्य सुविधाओं से लेकर, हॉस्पिटल और होम क्वारन्टीन में रखे लोगों के लिए बनाई निगरानी समिति पर ख़ुद जिलाधिकारी नज़र बनाये हुए हैं, ताकि कहीं भी कोई चूक न होने पाए। बावजूद इसके कोरोना है कि मान ही नहीं रहा, लगता है कोरोना भी लोगों को अपनी चपेट में लेने के लिए बाहर आने के लिए ललकार रहा है। अब बात 1 अगस्त यानी शनिवार की करें तो अकेले जिले में 24 नए कोरोना मरीज मिले। जिसमें से लखनऊ लैब से 11 लोगों में कोरोना की पुष्टि हुई। तो एंटीजन किट टेस्ट में 11 और ट्रूनेट से दो लोगों में कोरोना कन्फर्म हुआ। जिसके साथ ही जिले में कुल संक्रमितों का आंकड़ा बढ़कर 759 पर पहुंच गया। जिले में अब तक कुल 17 लोगों की कोरोना से मौत भी हो चुकी है।

अइसेन मा,
प्रकाश न्यूज़ ऑफ़ इंडिया आपसे अपील करत है भैया घरे से बिना जरूरत बाहर न निकला, कोरोना के ललकार म अउबा त कोरोना पटखनी देय बिना तैयार ब। घरे म रहा हिम्मत रखा, कोरोना गाइडलाइन कय पालन करा। जल्दिन सब ठीक होय जाए।



 महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद की आज जयंती है। इस अवसर पर पूरा देश उनको याद कर रहा है। चंद्रशेखर आजाद भारत के उन महान क्रांतिकारियों में से एक हैं जिनके नाम से अंग्रेज कांपा करते थे। 
 23 जुलाई 1906 को सीताराम तिवारी और जगरानी देवी के घर एक बच्चा पैदा हुआ. उसका नाम रखा गया चंद्रशेखर. मध्य प्रदेश के भाबरा में पैदा हुए चंद्रशेखर का नाम आज़ाद कैसे पड़ा उसके पीछे कहानी है. आजाद की मम्मी उन्हें संस्कृत का विद्वान बनाना चाहती थी. पर आज़ाद का प्लान तो देश को अंग्रेजों से आज़ाद कराने का था. बेखौफ अंदाज के लिए जाने जाने वाले चंद्रशेखर सिर्फ 14 साल की उम्र में 1921 में गांधी जी के असहयोग आंदोलन से जुड़ गए थे। गांधीजी द्वारा असहयोग आंदोलन को अचानक बंद कर देने के कारण उनकी विचारधारा में बदलाव आया और वे हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के सक्रिय सदस्य बन गए। हम लाए हैं उनकी जिंदगी के कुछ रोचक किस्से.

 चंद्रशेखर तिवारी से चंद्रशेखर आज़ाद

जलियांवाला बाग कांड के बाद सारे बड़े क्रांतिकारी प्रोटेस्ट पर उतर आए थे. चंद्रशेखर ऐसे ही किसी प्रोटेस्ट का हिस्सा बने थे. जिसमें अंग्रेजों ने उन्हें अरेस्ट कर लिया. उस वक्त वो केवल 16 साल के थे. धरे गए थे तो कोर्ट में पेशी हुई. मजिस्ट्रेट ने जब नाम, पता, औऱ बाप का नाम पूछा तो चंद्रशेखर ने जवाब में कहा कि, मेरा नाम आज़ाद है, पिता का नाम स्वतंत्र और पता जेल है. चंद्रशेखर के इस जवाब को सुनकर मजिस्ट्रेट चौंक गया. उसने चंद्रशेखर को 15 दिनों तक जेल में रहने की सजा सुनाई. जेल में उन्हें अंग्रेजों ने बहुत पीटा. हर मार के बाद वो और सख्त होते गए. जेल से बाहर निकलते ही लोगों ने आज़ाद का स्वागत फूल और मालाओं से किया. अखबार में फोटो उनकी फोटो छपी वो भी धांसू कैप्शन के साथ. इसके बाद से लोग उन्हें आज़ाद के नाम से जानने लगे.
14 साल की उम्र से चुना क्रांति का रास्ता
चंद्रशेखर आजाद का जन्म आज ही के दिन यानी 23 जुलाई 1906 को हुआ था. उनका जन्म स्थान मध्य प्रदेश के अलीराजपुर जिले का भाबरा में हुआ था.  1920 में 14 वर्ष की आयु में चंद्रशेखर आजाद गांधी जी के असहयोग आंदोलन से जुड़े थे.
ऐसे आजाद हुआ उनका नाम
14 साल की ही उम्र में वो गिरफ्तार हुए और जज के समक्ष प्रस्तुत किए गए. यहां जज ने जब उनका नाम पूछा तो पूरी दृढ़ता से उन्होंने कहा कि आजाद. पिता का नाम पूछने पर जोर से बोले, 'स्वतंत्रता'. पता पूछने पर बोले  -जेल. इस पर जज ने उन्हें सरेआम 15 कोड़े लगाने की सजा सुनाई. ये वो पल था जब उनकी पीठ पर 15 कोड़े बरस रहे थे और वो वंदे मातरम् का उदघोष कर रहे थे. ये ही वो दिन था जब से देशवासी उन्हें आजाद के नाम से पुकारने लगे थे. धीरे धीरे उनकी ख्याति बढ़ने लगी थी.
बचपन से निशानेबाज थे आजाद
चंद्रशेखर आजाद की निशानेबाजी बचपन से बहुत अच्छी थी. दरअसल इसकी ट्रेनिंग उन्होंने बचपन में ही ले थी. सन् 1922 में चौरी चौरा की घटना के बाद गांधीजी ने आंदोलन वापस ले लिया तो देश के तमाम नवयुवकों की तरह आज़ाद का भी कांग्रेस से मोहभंग हो गया. जिसके बाद पण्डित राम प्रसाद बिस्मिल, शचीन्द्रनाथ सान्याल योगेशचन्द्र चटर्जी ने 1924 में उत्तर भारत के क्रान्तिकारियों को लेकर एक दल हिन्दुस्तानी प्रजातान्त्रिक संघ का गठन किया. चन्द्रशेखर आज़ाद भी इस दल में शामिल हो गए.
चंद्रशेखर आजाद ने 1928 में लाहौर में ब्रिटिश पुलिस ऑफर एसपी सॉन्डर्स को गोली मारकर लाला लाजपत राय की मौत का बदला लिया था. आजाद रामप्रसाद बिस्मिल के क्रांतिकारी संगठन हिंदुस्तान रिपब्लिक एसोसिएशन (एचआरए) से जुड़ने के बाद उनकी जिंदगी बदल गई. उन्होंने सरकारी खजाने को लूट कर संगठन की क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए धन जुटाना शुरू कर दिया. उनका मानना था कि यह धन भारतीयों का ही है जिसे अंग्रेजों ने लूटा है. रामप्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में आजाद ने काकोरी कांड (1925) में सक्रिय भाग लिया था.
 अपना संगठन बनाया
चौरा-चौरी घटना के बाद जब महात्मा गांधी ने अपना आंदोलन वापस ले लिया तो आजाद समेत कई युवा क्रांतिकारी कांग्रेस ले अलग हो गए और अपना संगठन बनाया।गांधीजी द्वारा असहयोग आंदोलन को अचानक बंद कर देने के कारण उनकी विचारधारा में बदलाव आया और वे हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के सक्रिय सदस्य बन गए। 
काकोरी कांड
आजाद काकोरी कांड में शामिल थे. उनके अंडर में 10 क्रांतिकारियों ने काकोरी में ट्रेन लूटी जिसमें फिरंगियों का पैसा जा रहा था. सारे पैसे अंग्रेज सिपाहियों के कंधे पर गन तानकर लोहे के उस बक्से से निकाल लिया. और वहां से निकल लिए. जो पैसे आज़ाद और उनके साथियों ने लूटे थे वो बहुत थे. और अंग्रेजी हुकूमत के थे. तो जाहिर सी बात है उसके लिए अंग्रेज खून देने और लेने दोनों पर उतारू हो गए थे. जिन लोगों ने ट्रेन को लूटा था उनको गोरे सिपाहियों ने खोज-खोज कर मारना शुरू किया. 5 उनकी पकड़ में आ गए. गोरों ने उन्हें मौत के घाट उतार दिया. आजाद भेस बदलने में माहिर थे. वो एक बार फिर से अंग्रेजों से बच निकले. नंगे पैर विंध्या के जंगलों और पहाड़ों के रास्ते चलकर वो जा पहुंचे कानपुर. जहां उन्होंने एक नई क्रांति की शुरुआत की. इस काम में भगत सिंह भी शामिल थे.
लाला लाजपत राय की मौत का बदला
लाला लाजपत राय की मौत का बदला आजाद ने ही लिया था। आजाद ने लाहौर में अंग्रेजी पुलिस अधिकारी सॉन्डर्स को गोली से उड़ा दिया था। इस कांड से अंग्रेजी सरकार सकते में आ गई। आजाद यही नहीं रुके उन्होंने लाहौर की दिवारों पर खुलेआम परचे भी चिपकाए। परचों पर लिखा था कि लाला लाजपत राय की मृत्यु का बदला ले लिया गया है। 
आजाद हैं, आजाद रहेंगे
चंद्रशेखर आजाद कहते थे कि 'दुश्मन की गोलियों का, हम सामना करेंगे, आजाद ही रहे हैं, आजाद ही रहेंगे' उनके इस नारे को एक वक्त था कि हर युवा रोज दोहराता था. वो जिस शान से मंच से बोलते थे, हजारों युवा उनके साथ जान लुटाने को तैयार हो जाता था.
...और आखिर में
Chandra Shekhar Azad इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में सुखदेव और अपने एक अन्य और मित्र के साथ योजना बना रहे थे. अचानक अंग्रेज पुलिस ने उनपर हमला कर दिया. आजाद ने पुलिस पर गोलियां चलाईं ताकि उनके साथी सुखदेव बचकर निकल सकें. पुलिस की गोलियों से आजाद बुरी तरह घायल हो गए थे. वे सैकड़ों पुलिस वालों के सामने 20 मिनट तक लोहा लेते रहे. आखिर में उन्हेांने अपना नारा आजाद है आजाद रहेंगे अर्थात न कभी पकड़े जाएंगे और न ब्रिटिश सरकार उन्हें फांसी दे सकेगी को याद किया. इस तरह उन्होंने पिस्तौल की आखिरी गोली खुद को मार ली और मातृभूमि के लिए प्राणों की आहुति दे दी. वैसे इस तथ्य को लेकर कई विवाद भी सामने आते हैं, जिसकी अभी तक पुष्टि नहीं हो सकी है.
मौत के बाद भी था अंग्रेजी पुलिस में डर

जब आजाद ने गोली मारी तो भी अंग्रेजी पुलिस की उनके पास जाने की हिम्मत नहीं हुई। काफी देर बाद जब वहां से गोली नहीं चली तो अंग्रेजो थोड़ा आगे बढ़े। उनकी नजर आजाद के मृत शरीर पर पड़ी तो उन्हें होश में होश आया। अपनी अंतिम लड़ाई में आजाद ने अंग्रेजों की पूरी टीम के छक्के छुड़ा दिए थे। जिस पार्क में चंद्रशेखर आजाद हमेशा के लिए आजाद हो गए आज उस पार्क को चंद्रशेखर आजाद पार्क के नाम से जाना जाता है।  


By: सुरभि तिवारी |PrakashNewsOfIndia.in|
Edited: Mon, 18 May 2020; 06:25:00 PM

चीन के वुहान शहर से फैलने वाले कोरोना वायरस नें (जिसे COVID- 19 का नाम दिया गया है) पूरे विश्व में कोहराम मचा रखा है। लोग इस कोरोना रूपी काल का ग्रास बनते जा रहे हैं। सभी देशों नें इस महामारी से बचने का उपाय एक दूसरे से दूरी बताया है। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नें भी अपने देश की जनता की रक्षा के लिए 25 मार्च से पूरे देश में लॉकडाउन का आह्वान किया है।
हम सभी जानते हैं विभिन्न राज्यों से बहुत से लोग रोज़ी रोटी की तलाश में एक राज्य से दूसरे राज्य आते जाते रहते हैं। रोजगार की तलाश में अपना गांव, घर, शहर और परिवार छोड़ जाते हैं। ध्यातव्य है कि लॉकडाउन की वजह से सभी औद्योगिक प्रक्रियाएं ठप पड़ गयी जिससे इनमें काम कर रहे मजदूरों को अपने रोजगार से हाथ धोना पड़ा। फिर शुरू हुआ इस महामारी के फ़ैलने का असली खेल। 
            रोते मजदूरों की दुर्दशा           

प्रवासी मजदूरों की दयनीय दशा
इन दिनों अपने घर लौटते मजदूरों की तस्वीरें और नंगे पांव चलते, भूख से बिलखते उनके बच्चों की दयनीय दशा देखकर शायद ही कोई अपनी आंखों में आंसू आने से रोक पाए। इन मजदूरों को किस गलती की इतनी बड़ी सजा मिल रही है? शायद ही किसी के पास इसका जबाब हो। किसी नें ठीक ही कहा है की इस पापी पेट को पालने के लिए कुछ भी करना पड़ता है। अपने रोजगार के चले जाने के बाद इन मजदूरों को एक वक्त की रोटी मिलना भी मुश्किल हो गया। जिसके चलते इन मजदूरों को अपने गांव की याद सताने लगी, फिर तो सम्पूर्ण देश में मजदूरों के झुंड के झुंड पैदल ही नजर आने लगे। वे इस महामारी के कारण सब कुछ दांव पर लगाकर घर वापस आ रहे हैं। उनके मन में यह आस है कि गांव पहुँचने के बाद उनकी सारी समस्याओं का अंत हो जाएगा। वे अपने शारीरिक कष्ट को भूलकर पैदल ही चले जा रहे हैं।
लेकिन दुःख की बात यह है कि उनमें से कितने ही अपनी मंजिल तक पहुँचने से पहले ही मौत के शिकार हो जा रहे हैं। चाहे वह महाराष्ट्र के औरंगाबाद का हादसा हो या फ़िर उत्तर प्रदेश के औरैया का हादसा हो देश के अंदर हो रहे कई अन्य हादसों में मौत नें जो तांडव मचाया है उसे हर कोई अपनी गीली आंखों से देखने को मजबूर है। इन सभी हादसों से मन इतना व्यथित होता है कि बार बार एक ही सवाल दिल और दिमाग को झकझोरता है कि क्या इनको इनके गरीब होने की सजा मिल रही है और अगर ये गरीब हैं तो इन्हें गरीब बनाया किसने? वहीं सरकारों का कहना है कि वह इन मजदूरों की वापसी के लिए प्रयास कर रही है। समझ नहीं आता कि सरकारें कुछ करती भी हैं या सिर्फ कहती ही हैं, और अगर करती भी हैं तो प्रशासन में कौन सी ऐसी कमियां हैं जिसके चलते इन मजदूरों के पैदल पलायन पर रोक नही लग पा रही है।
प्रशासन की कमियों का सबसे ताजा उदाहरण औरंगाबाद हादसा ही है। क्या तैनाती पर लगे पुलिसकर्मियों को यह पैदल मजदूर आते नहीं दिखे? अगर दिखे तो उन्होंने रोका क्यों नहीं? इन मजदूरों को रोका गया होता और इनके जाने का उचित प्रबंध किया गया होता तो यह हादसा होता ही ना उत्तर प्रदेश के औरैया में 25 मजदूरों की मौत भी प्रशासन की लापरवाही उजागर करती है।
क्या है समस्या का समाधान?
राज्यों की सरकारों ने संकट के निवारण के लिए कई महत्वपूर्ण एवं आवश्यक कदम उठाए हैं जैसे कि रास्तों में जगह-जगह कैम्पों की व्यवस्था की गई है। जिसमें मजदूरों के रहने और भोजन की व्यवस्था की गई है। पैदल ही मजदूरों के पलायन पर रोक के लिए राज्य की सरकारों ने अपने राज्य के मजदूरों की सुरक्षित घर वापसी के लिए श्रमिक स्पेशल ट्रेनों और बसों की व्यवस्था की। कोरोना वायरस के संक्रमण को रोकने के लिए मास्क का वितरण किया जा रहा है। इन मजदूरों की रोजी-रोटी की व्यवस्था के लिए उनके ही राज्य में रोजगार की व्यवस्था की जा रही है।



Written By
आनंद माधव तिवारी|prakashnewsofindia.in|
Updated: Sat 25 April 2020, 02:31:00 AM

संपादकीय
बढ़ते कोरोना संकट के बीच यह आंकड़ा भले ही उम्मीद की किरण के रूप में दिख रहा है कि देश के 23 राज्यों के 78 जिलों में बीते 14 दिनों से कोरोना वायरस के संक्रमण का कोई नया मामला नहीं मिला है। इस सबके बावजूद सच्चाई यही है कि कोरोना के तीसरे स्टेज में जाने का ख़तरा पूरे देश में अभी भी पूरी तरह से ज्यों का त्यों है। इसका प्रमाण यह है कि देश के कुछ हिस्सों से संक्रमण के नए मामले सामने आते जा रहे हैं। कई जगहों पर तो उनकी संख्या काफी असंतोषजनक है। वास्तव में इसी कारण लॉकडाउन बढ़ाने की जरूरत पड़ रही है। फ़िलहाल देशभर में लॉकडाउन 3 मई तक लागू है। इसी बीच 27 अप्रैल यानी सोमवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये संवाद करेंगें। उम्मीद है कि जब प्रधानमंत्री राज्य सरकारों से यह आग्रह खास तौर पर करेंगे कि कोरोना प्रभावित इलाकों में एक ओर जहां और सख्ती का परिचय दिया जाए वहीं दूसरी ओर संदिग्ध कोरोना मरीजों की पहचान के काम में तेजी लाई जाए। कोरोना के कहर से बचे रहने का उपाय भी यही है। नि:संदेह कोरोना के खिलाफ लड़ी जा रही जंग एक कठिन लड़ाई है, लेकिन उसे जीतने के अलावा और कोई उपाय नहीं। इस लड़ाई को तभी आसान बनाया जा सकता है जब हमारा स्वास्थ्य तंत्र संसाधनों की कमी का सामना न करने पाए और लोग सोशल डिस्टेंसिंग यानी एक-दूसरे से शारीरिक दूरी बनाए रखने के प्रति हर क्षण सचेत रहें। इसमें तनिक भी लापरवाही सारे किए-कराए पर पानी फेर देगी। बहरहाल अभी प्रभावित इलाकों के लाखों लोगों का कोरोना परीक्षण करने की जरूरत है। इस जरूरत की पूर्ति के लिए जो भी संसाधन चाहिए वे प्राथमिकता के आधार पर उपलब्ध कराए जाने चाहिए। इसी के साथ यह भी सुनिश्चित करना होगा कि लॉकडाउन का पालन सही तरह हो।
                                संपादकीय Written By
                                  आनंद माधव तिवारी
                            Founder & Chief Editor






यदि कोई यह पूछे कि वह कौन युवा योद्धा  संन्यासी था, 
जिसने विश्व पटल पर भारत और सनातन की कीर्ति पताका फहराई, तो सबके मुख से निःसंदेह स्वामी विवेकानन्द का नाम ही निकलेगा।

National Youth Day: स्वामी विवेकानंद की जयंती के मौके पर हर साल 'नेशनल यूथ डे' मनाया जाता है। भारत सरकार ने 1984 में 12 जनवरी को नेशनल यूथ डे की घोषणा की थी और 1985 से ये दिन हर साल इसी रूप में मनाया जाता है।


आइये जानते हैं, स्वामी विवेकानंद जी के बारे में

विवेकानन्द का बचपन का नाम नरेन्द्र था। उनका जन्म कोलकाता में 12 जनवरी, 1863 को हुआ था। बचपन से ही वे बहुत शरारती, साहसी और प्रतिभावान थे। पूजा-पाठ और ध्यान में उनका मन बहुत लगता था।

नरेन्द्र के पिता उन्हें अपनी तरह प्रसिद्ध वकील बनाना चाहते थे; पर वे धर्म सम्बन्धी अपनी जिज्ञासाओं के लिए इधर-उधर भटकते रहते थे। किसी ने उन्हें दक्षिणेश्वर के पुजारी श्री रामकृष्ण परमहंस के बारे में बताया कि उन पर माँ भगवती की विशेष कृपा है। यह सुनकर नरेन्द्र उनके पास जा पहुँचे।

वहाँ पहुँचते ही उन्हें लगा, जैसे उनके मन-मस्तिष्क में विद्युत का संचार हो गया है। यही स्थिति रामकृष्ण जी की भी थी; उनके आग्रह पर नरेन्द्र ने कुछ भजन सुनाये। भजन सुनते ही परमहंस जी को समाधि लग गयी। वे रोते हुए बोले, नरेन्द्र मैं कितने दिनों से तुम्हारी प्रतीक्षा में था। तुमने आने में इतनी देर क्यों लगायी ? धीरे-धीरे दोनों में प्रेम बढ़ता गया। वहाँ नरेन्द्र की सभी जिज्ञासाओं का समाधान हुआ।*

*उन्होंने परमहंस जी से पूछा - क्या आपने भगवान को देखा है ? उन्होंने उत्तर दिया - हाँ, केवल देखा ही नहीं उससे बात भी की है। तुम चाहो तो तुम्हारी बात भी करा सकता हूँ। यह कहकर उन्होंने नरेन्द्र को स्पर्श किया। इतने से ही नरेन्द्र को भाव समाधि लग गयी। अपनी सुध-बुध खोकर वे मानो दूसरे लोक में पहुँच गये।

अब नरेन्द्र का अधिकांश समय दक्षिणेश्वर में बीतने लगा। आगे चलकर उन्होंने संन्यास ले लिया और उनका नाम विवेकानन्द हो गया। जब रामकृष्ण जी को लगा कि उनका अन्त समय पास आ गया है, तो उन्होंने विवेकानन्द को स्पर्श कर अपनी सारी आध्यात्मिक शक्तियाँ उन्हें दे दीं। अब विवेकानन्द ने देश-भ्रमण प्रारम्भ किया और वेदान्त के बारे में लोगों को जाग्रत करने लगे।

उन्होंने देखा कि ईसाई पादरी निर्धन ग्रामीणों के मन में हिन्दू धर्म के बारे में तरह-तरह की भ्रान्तियाँ फैलाते हैं। उन्होंने अनेक स्थानों पर इन धूर्त मिशनरियों को शास्त्रार्थ की चुनौती दी; पर कोई सामने नहीं आया। इन्हीं दिनों उन्हें शिकागो में होने जा रहे विश्व धर्म सम्मेलन का पता लगा। उनके कुछ शुभचिन्तकों ने धन का प्रबन्ध कर दिया। स्वामी जी भी ईसाइयों के गढ़ में ही उन्हें ललकारना चाहते थे। अतः वे शिकागो जा पहुँचे।

शिकागो का सम्मेलन वस्तुतः दुनिया में ईसाइयत की जयकार गुँजाने का षड्यन्त्र मात्र था। इसलिए विवेकानन्द को बोलने के लिए सबसे अन्त में कुछ मिनट का ही समय मिला; पर उन्होंने अपने पहले ही वाक्य ‘अमरीकावासियो भाइयो और बहिनो’ कहकर सबका दिल जीत लिया। तालियों की गड़गड़ाहट से सभागार गूँज उठा। यह 11 सितम्बर, 1893 का दिन था। उनका भाषण सुनकर लोगों के भ्रम दूर हुए। इसके बाद वे अनेक देशों के प्रवास पर गये। इस प्रकार उन्होंने सर्वत्र हिन्दू धर्म की विजय पताका लहरा दी।

भारत लौटकर उन्होंने श्री रामकृष्ण मिशन की स्थापना की, जो आज भी विश्व भर में वेदान्त के प्रचार में लगा है। जब उन्हें लगा कि उनके जीवन का लक्ष्य पूरा हो गया है, तो उन्होंने 4 जुलाई, 1902 (अमेरिकी स्वतंत्रता दिवस ) को महासमाधि लेकर स्वयं को परमात्म में लीन कर लिया।

विवेकानंद के जीवन से जुड़ी कई घटनाएं और उनका कथन आज भी कई प्रकार के सीख देता है। पढ़ें, स्वामी विवेकानंद के 10 अनमोल विचार..

1. जो हमारी सोच हमे बनाती है, हम वही बनते हैं। इसलिए हमेशा अपनी सोच को लेकर सतर्क रहें। शब्द का महत्ता दूसरे दर्जे की है। विचार जिंदा रहते हैं और वे ही आगे बढ़ते हैं। 
2. ब्रह्मांड में मौजूद सभी शक्तियां पहले से ही हम सभी में मौजूद हैं। ये हम हैं जो अपने हाथों को अपनी आंखों के सामने रख लेते हैं और फिर रोते रहते हैं चारो ओर अंधेरा है।
3. अगर पैसा दूसरों की मदद करने में योगदान करता है तो फिर ये काम की चीज है। इसका कोई मूल्य है। अगर ऐसा नहीं है तो ये फिर शैतान की तरह है। ऐसे में ये जितनी जल्दी हमसे दूर हो जाए, उतना ही अच्छा होगा।
4. एक समय में एक काम करो और ऐसा करते हुए अपनी पूरी शक्ति, आत्मा उसमें डाल दो। बाकी सब कुछ भूल जाओ। 
5. ज्ञान स्वयं में वर्तमान है, मनुष्य केवल उसका आविष्कार करता है।
6. उठो और जागो और तब तक नहीं रूको जब तक कि तुम अपना लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर लेते।
7. जब तक आप खुद पर भरोसा करना नहीं सीखते तब तक भगवान भी आप पर भरोसा नहीं करते हैं।
8. दुनिया के तमाम लोग तुम्हारी स्तुति करें या निन्दा, लक्ष्य तुम्हारे ऊपर कृपालु हो या न हो, तुम्हारा देहांत आज हो या किसी और युग में, लेकिन तुम न्यायपथ से कभी भ्रष्ट नही होना।
9. जितना बड़ा संघर्ष होगा, जीत उतनी ही शानदार होगी।
10. किसी दिन आपके सामने कोई समस्या न आए तो आप इस बात का भरोसा कर सकते हैं कि आप गलत मार्ग पर चल रहे हैं।


  

 शुभम तिवारी

दिसम्बर  महीना आते ही एक चमक सी लोगो मे देखने को मिलती है।सब 31 दिसम्बर का इंतजार करने लगते हैं।फिर एक दिन आ ही जाती है वह रात जिसका रहता है सबको इंतजार। सुबह से पार्टी की चर्चा गावो के गलियारों से होती हुई,कस्बों-शहरो के गलियों के बीच महानगरों के पाँच सितारा होटलों तक पहुच जाती है।सुबह से तैयारियां शुरू,सारे इंतजामात पूरे कर लिये जाते हैं।फिर सुर्यास्त होते ही सुरु होता है सेलिब्रेशन का दौर।संगीत के नाम पर तेज और हानिकारक डीजे जो कि ध्वनि प्रदूषण को बढ़ावा देता है का उपयोग होता है।गानों के नाम पर अश्लीलता परोसी जाती है।गन्दे-गन्दे गानों और हो हल्ला के बीच मदिरा के मद में मस्त भारत के भविष्य युवाओं को ठुमका लगाते, लड़खड़ाते और लड़ते देखा जा सकता है।एक दूसरे से अधिक पीने की होड़ और नाचते-नाचते जमीन पर लोट पोट करने की होड़ सुरु हो जाती है।यही नही  सुरु होता है अन्य भयंकर मादक पदार्थों के सेवन का दौर।
मदिरा और मादक पदार्थों के मद में मस्त इन मानसिक अस्वस्थ,भारत के भविष्योँ को फूहड़ धुन पर अश्लीलता पूर्वक नृत्य को देखकर समाज का एक तबका जिन्हें इनकी भाषा मे ट्रेडिशनल कहा जाता है, इनसे किनारा करते नजर आते हैं।धीरे धीरे समय बीतता है, मादकता बढ़ती है और ये लोग आपस मे लड़ते देखे जा सकते हैं।कभी कभी यही छोटे छोटे झगड़े किसी की जान तक लेकर ही रुकते हैं।
आज इस तथाकथित 31 सेलिब्रेशन के नाम पर ये जो मदिरा और अन्य गम्भीर नशे के पदार्थों के सेवन का चलन शुरू हुआ है, ये अत्यंत ही चिंतनीय और सुधारणीय विषय है।कैरियर बनाने की उम्र में युवा  गंभीर नशे के लती हो जाते हैं, जिससे आगे चलकर ये गम्भीर बिमारी और तो और इनकी यह प्रवृत्ति घरेलू हिंसा के कारण बनने से नही चूकती।

इन सब से परे हम भारतीय उत्सवधर्मिता को पसंद करने वाले लोग हैं।खुशी ढूढ़ने में हम संकोच नही करते हैं।हमारा देश विविधताओं का देश हैं यह तो सभी को सहर्श स्वीकृत है और होना भी चाहिए क्योकी यही हमारा आधार है, परन्तु सेलीब्रेशन के नाम पर हमारे देश के भविष्य  युवाओं का नशे की प्रवृत्ति की तरफ झुकाव कतई बर्दाश्त नही होना चाहिये।एक तरफ स्वस्थ और समृद्ध भारत की परिकल्पना और दूसरी तरफ सेलिब्रेशन के नाम पर भयंकर नशे में डूबना बन्द होना चाहिए।नही तो आने वाला समय बहुत ही भयावक होगा।

क्या है सिएबी और सिएए ?

सिटिजनशिप अमेंडमेंट बिल(सिएबी)संसद से पास होने के बाद अब सिटिजनशिप अमेंडमेंट ऐक्ट(सिएए)
यानी कानून बन चुका है। इस कानून के प्रावधानों के तहत तीन पड़ोसी देशों पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के उन छह धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को भारतीयता नागरिकता देने की प्रक्रिया में ढील दी गई है जिन्होंने भारत में शरण ले रखी है।वास्तव में ये कानून महात्मा गाँधी समेत संविधान निर्माताओं के इक्छा को मूर्ती रूप प्रदान किया गया है जिसके अंतर्गत सन 1947 के धार्मिक बटवारे के बाद भी  पुर्वी पाकिस्तान और पश्चिमी पाकिस्तान में रह गए हिन्दुओ,सिक्खों से उन्होंने अपील की थी भविष्य में कभी भी इन लोगों के साथ कोई धार्मिक अत्याचार होता है तो भारत के द्वार हमेशा के लिये खुला है।
इस बिल के पास होने के उपरांत भारत बचाओ के नाम से देश के राजधानी में विशाल प्रदर्शन ने तो जैसे देश की हवा का रुख ही बदल दिया। इस नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के दुष्प्रचार ने पूरे देश को हिसक बना दिया।देश को अस्थिर करने और आंतरिक सुरक्षा को तोड़ने की पुरजोर कोशिश हुई।
वास्तव में नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) किसी भारतीय नागरिक के लिए बना ही नहीं है बल्कि पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश से आए अल्पसंख्यक शरणार्थियों के लिए बना है। विडम्बना यह है कि कुछ लोगों को बलगलाकर कुछ राजनीतिक द्वेष भावना से युक्त लोग भारतवर्ष का आपसी सौहार्द बिगाड़ने का कार्य कर रहे हैं, जो बहुत ही निंदनीय व अस्वीकार्य है। जहां कश्मीर जैसी पत्थरबाजी उत्तर प्रदेश या दिल्ली में हुई , वह स्वतःस्फूर्त नहीं थी । उनका प्रारंभ बाहर से आए पेशेवर गुंडों ने किया । वे पत्थर फेंकना और आगजनी कर गायब हो गए । वहीं प्रदर्शनकारियों को यह भी समझना चाहिए कि लोकतंत्र में हिंसा का कोई स्थान ही नहीं है।अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, नदवा कॉलेज, इस्लामिया कॉलेज आदि शिक्षा संस्थानों से जिस प्रकार की अपेक्षा है, उस पर खरा नहीं उतरते। सीएए के विरोध की आड़ में हिंसा, आगजनी जैसी घटनाएं शिक्षा  संस्थानों के माध्यम से हुई हैं, जो दुर्भाग्यपूर्ण है। विरोध प्रदर्शन के समय राष्ट्रीय ध्वज हाथ में लेकर जो व्यक्तिगत, सरकारी संपत्तियो को नुकसान पहुंचाते हैं क्या वह लोग वास्तव में देश भक्त हो सकते हैं, यह सोचने का, विषय है।जबकि सर्वोच्च न्यायालय दोनों मामलों में संवैधानिकता तय करने के प्रश्न को अपने हाथ में ले चुका है , फिर उन्हें सड़कों पर विरोध , और वह भी सार्वजनिक संपत्ति जलाने वाला हिंसक विरोध करने की जरूरत क्या है ? क्यों नहीं शांत रहकर कोर्ट के निर्णय की प्रतीक्षा करते ? रामजन्मभूमि पर क्या यही लोग रामभक्तों को धैर्य से प्रतीक्षा का उपदेश नहीं दे रहे थे ? उच्चतम न्यायालय ने जामिया मिलिया की याचिका ठुकराते हुए ठीक ही कहा कि पहले हिंसा बंद कीजिए , उसके बाद ही सनवाई होगी । विरोधी लोग न्यायपालिका को तो सुनें , अनुपालन करें । परन्तु नहीं प्रोटेस्ट की आड़ में उन्माद फैला रहे हैं।
सँविधान की दुहाई और भारत बचाओ की भावना से ओतप्रोत  का दिखावा करने वाले राजनीतिक महत्वाकांक्षी, सत्त्ता के भूखे भेड़ियों को यह भि पता होना चाहिए कि संविधान का अनुच्छेद 51 ए / बी कहता है कि ' सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा और हिंसा से दूर रहना ' भी संवैधानिक कर्तव्य है , लेकिन हाल के कई आंदोलनों में ये आदर्श सिरे से गायब दिखे हैं । स्वाधीनता आंदोलन में जब विदेशी सत्ता से भारत का टकराव था तब भी आंदोलन आदर्श जीवन मूल्यों से प्रतिबद्ध था तो इसीलिए कि यह भाव प्रबल था कि आंदोलन की अपनी मर्यादा बनी रहनी चाहिए । गांधी जी स्वाधीनता आंदोलन के निर्विवाद नेता थे, जिनके सरनेम के टैग से आज भी भारतीय राजनीति का एक परिवार जाना जाता है, ने आन्दोलन की धार तेज करने के लिए उन्हें सरकारी आदेशों की अवज्ञा का विचार आया । गांधी जी ने इसे ' सविनय अवज्ञा ' आंदोलन कहा । मार्च 1940 में उनसे बार - बार पूछा जा रहा था कि सविनय अवज्ञा आंदोलन कब शुरू करेंगें ? गांधी जी ने कांग्रेस कार्यसमिति में कहा , ' देश अभी सविनय अवज्ञा आंदोलन के लिए तैयार नहीं है । छोटी सी अनुशासनबद्ध कांग्रेस को लेकर मैं विश्व से लड़ सकता हूं , लेकिन कांग्रेस लचर है । सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू किया गया तो ' अवज्ञा ' ही बचेगी , ' सविनय ' लप्त हो जाएगा । गांधी जी के आंदोलन आदर्श में ' सविनय ' महत्वपूर्ण था । अहिंसा और भी महत्वपूर्ण । उन्होंने कहा कि ' कांग्रेस के भीतर अनुशासनहीनता और हिंसा भरी है । ऐसे में सविनय अवज्ञा आंदोलन का एलान आत्महत्या से कम नहीं।

आप सबसे अपील है कि कोई भी बिल एक्ट बनने के बाद भारतीय संविधान का हिस्सा बन जाता है, जिसका विरोध संविधान के दायरे में रहकर ही करना चाहिए,इसलिए  किसी के बहकावे में आकर राष्ट्र के विरोध में कोई कार्य न करें,हमको आप को यहीं रहना है,राष्ट्र विरोधी ताकतों, विचारों को कुचलने का काम करें राष्ट्रीय एकता और अखंडता को बनाए रखने में सहयोग करें।

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