يناير 2026

 (राष्ट्रीय युवा दिवस विशेष)

उठो, युवा!
यह कोई साधारण सुबह नहीं है।
यह भारत की आत्मा का आह्वान है।
यह उस अग्नि की पुकार है
जो युगों से तपस्या में थी
और आज तुम्हारी शिराओं में
विवेकानंद बनकर उतर आई है।

उपनिषद गर्जना करते हैं

उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत्।
उठो, जागो और श्रेष्ठ लक्ष्य को प्राप्त करो।

क्योंकि सोया हुआ युवा केवल स्वयं नहीं हारता
वह पूरे राष्ट्र की संभावनाओं को निद्रा में धकेल देता है।

तुम केवल युवा नहीं हो।
तुम

अर्जुन की वह भुजा हो
जो संशय के बाद भी धनुष उठाती है।
तुम हनुमान जी की वह उड़ान हो
जो अपनी शक्ति याद आते ही
समुद्र को छोटा कर देती है।
तुम भगवान श्री राम की वह मर्यादा हो
जो सत्ता नहीं, संस्कार से राज्य चलाती है।

गीता तुम्हें ललकारती है

क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ।
हे युवा! कायरता को मत अपनाओ।

इतिहास ने तुम्हारे हाथ में
पहले ही धनुष थमा दिया है
अब लक्ष्य साधना तुम्हारा धर्म है।

भारत ने 12 जनवरी को
राष्ट्रीय युवा दिवस घोषित किया, क्योंकि राष्ट्र जानता है

देश बजट से नहीं बनते,
देश घोषणाओं से नहीं बनते,
देश चरित्रवान युवाओं से बनते हैं।

यह दिन केवल
स्वामी विवेकानंद की जयंती नहीं है
यह भारत की भविष्य-नीति है।

यह दिन कहता है
युवा आत्महीन नहीं, आत्मनिर्भर बने।
युवा भोगी नहीं, राष्ट्रयोगी बने।

तुलसीदास जी चेतावनी देते हैं

पराधीन सपनेहुँ सुख नाही।

जो अपनी संस्कृति भूलता है,
वह स्वतंत्र होकर भी
भीतर से गुलाम रहता है।

और वही तुलसी
राष्ट्र का सूत्र भी देते हैं

परहित सरिस धरम नहि भाई।

राष्ट्रहित से बड़ा
कोई धर्म नहीं,
कोई साधना नहीं।

 आज भारत

युवा से केवल डिग्री नहीं माँगता।
भारत चाहता है

दृढ़ चरित्र,
तकनीकी दक्षता,
संस्कृति से जुड़ी चेतना,
और राष्ट्र के लिए समर्पित हृदय।

स्वामी विवेकानंद जी ने कहा था

“Give me a hundred fearless youths,
and I will change the destiny of India.”

आज भारत उसी स्वप्न को नीतियों में ढाल रहा है

Skill India, Startup India, Digital India,
और आत्मनिर्भर भारत

इन सबका केंद्र
एक ही है
युवा शक्ति। 

याद रखो

जब हनुमान जी जागतें हैतो लंका काँपती है।

जब अर्जुन उठता है,तो कुरुक्षेत्र बदल जाता है।

और जब भारत का युवा जागता हैतो दुनिया का भाग्य बदलता है।

आज केवल युवा दिवस नहीं है।
आज युवा-धर्म का उद्घोष है।

आज यह दिन पूछता है

क्या तुम केवल नौकरी ढूँढोगे?
या
नया भारत गढ़ोगे?

और अंत में
माँ भारती तुम्हें पुकार रही हैं

मेरे लालो!
मैं इतिहास थी,
अब भविष्य तुम्हारे हाथ में है।
मेरे स्वाभिमान की रक्षा करो,
मेरे सपनों का भारत बनो।

उठो युवा!
तुम भारत की अंतिम आशा नहीं
तुम उसकी प्रथम शक्ति हो।

जय माँ भारती।

 


शुभम तिवारी,शोध छात्र  

प्रेम मनुष्य की सबसे कोमल अनुभूति है।
यह जीवन को संवेदना देता है,
हृदय को विस्तार देता है।
परंतु वही प्रेम
जब विवेक से कट जाता है
तो स्नेह नहीं रहता,
बंधन बन जाता है।
और बंधन धीरे-धीरे
मनुष्य को उसके लक्ष्य, कर्तव्य
और अंततः उसके अस्तित्व से दूर ले जाता है।

आज का युवा
प्रेम और आशक्ति के अंतर को भूलता जा रहा है।
वह आकर्षण को समर्पण समझ बैठा है,
और क्षणिक भावनाओं के लिए
अपने कैरियर, माता-पिता, संस्कार और जीवन तक को
दाँव पर लगा रहा है।

भारतीय दर्शन प्रेम का विरोध नहीं करता,
पर वह स्पष्ट चेतावनी देता है—
आसक्ति पतन का द्वार है।

प्रेम और आशक्ति का भेद : गीता की चेतावनी

श्रीमद्भगवद्गीता कहती है

“सङ्गात् संजायते कामः, कामात् क्रोधोऽभिजायते।
क्रोधाद्भवति सम्मोहः, सम्मोहात् स्मृतिविभ्रमः॥”
(गीता 2.62–63)

अर्थात
आसक्ति से कामना,
कामना से मोह,
और मोह से विवेक का नाश होता है।

आज यही विवेक-नाश
युवाओं को यह सोचने पर मजबूर कर रहा है 
“उसके बिना मैं कुछ नहीं।”

जबकि सत्य यह है
आपके बिना भी दुनिया चल सकती है,
पर आपके बिना आपके माता-पिता नहीं।

माता-पिता का प्रेम : बिना शर्त, बिना सौदे के

उपनिषद उद्घोष करते हैं

“मातृदेवो भव।
पितृदेवो भव।”

माता-पिता इसलिए देव हैं क्योंकि
उन्होंने कभी विकल्प नहीं रखा,
कभी शर्त नहीं रखी,
कभी बदले में कुछ नहीं माँगा।

वे तब भी आपके साथ थे
जब आप शून्य थे
न पहचान, न उपलब्धि, न सामर्थ्य।

और आज
यदि कोई प्रेम आपसे कहे
“परिवार छोड़ दो”,
“माता-पिता समझते नहीं”,
“मेरे लिए सब कुछ त्याग दो”
तो समझ लीजिए
वह प्रेम नहीं, संस्कारहीन आग्रह है।

प्रेम और कर्तव्य : धर्म की कसौटी

भारतीय परंपरा में
हर संबंध की परीक्षा
धर्म (कर्तव्य) से होती है।

रामचरितमानस कहता है

“धीरज धरम मित्र अरु नारी,आपद काल परखिए चारी।”

संकट में वही प्रेम टिकता है
जो
आपके लक्ष्य का सम्मान करे,
आपके माता-पिता को आदर दे,
आपके भविष्य को सुरक्षित रखे।

जो प्रेम
आपको आपके कर्तव्यों से तोड़े,
वह प्रेम नहीं
अधर्म है।

कैरियर नष्ट हुआ तो प्रेम भी बोझ बन जाता है

यह कड़वा, पर अटल सत्य है
जब पढ़ाई छूटती है,
जब नौकरी नहीं मिलती,
जब आत्मनिर्भरता नहीं होती
तब वही प्रेम आपसे प्रश्न करता है
“अब आगे क्या?”

महाभारत का सूत्र है

“न धर्मोऽर्थेन हीनस्य।”

जिसके पास आधार नहीं,
उसके लिए न धर्म टिकता है,
संबंध

इसलिए याद रखिए
बिना आत्मनिर्भर बने प्रेम करना,
अपने ही भविष्य के साथ अन्याय है।

जीवन अमूल्य है किसी के लिए समाप्त करने योग्य नहीं

कोई प्रेम, कोई रिश्ता, कोई व्यक्ति
इतना बड़ा नहीं
कि उसके लिए आप
अपना जीवन, अपनी शिक्षा
या अपने माता-पिता की उम्मीदें खो दें।

गीता स्पष्ट आदेश देती है

“उद्धरेदात्मनाऽत्मानं,नात्मानमवसादयेत्।”
(गीता 6.5)

मनुष्य को स्वयं अपना उद्धार करना चाहिए,
खुद को गिराना नहीं।

यदि कोई प्रेम
आपको तोड़ रहा है, डरा रहा है,
या जीवन से विमुख कर रहा है
तो वह प्रेम नहीं,
मानसिक बंधन है।

सच्चे प्रेम की पहचान यह है कि

सच्चा प्रेम
आपको बेहतर मनुष्य बनाता है,
आपके कैरियर को संबल देता है,
आपके माता-पिता का सम्मान करता है,
आपके जीवन की रक्षा करता है।

जो प्रेम
इन कसौटियों पर खरा न उतरे,
उसे छोड़ देना
कायरता नहीं, बुद्धिमत्ता है।

अंतिम निवेदन (युवान/ युवतियों से)

याद रखिए
प्रेम जीवन का अंश है, लक्ष्य नहीं।
माता-पिता जीवन की जड़ हैं।
कैरियर जीवन की रीढ़ है।
और आपका जीवन अमूल्य धरोहर।

प्रेम में डूबिए जरूर,
पर
अपने अस्तित्व को मत डुबोइए।

सादर



 ( युवाओं के लिए एक जरूरी आत्म-संवाद )

शुभम तिवारी,शोध छात्र  

प्रेम मनुष्य की सबसे कोमल अनुभूति है।
यह जीवन को संवेदना देता है,
हृदय को विस्तार देता है।
परंतु वही प्रेम
जब विवेक से कट जाता है
तो स्नेह नहीं रहता,
बंधन बन जाता है।
और बंधन धीरे-धीरे
मनुष्य को उसके लक्ष्य, कर्तव्य
और अंततः उसके अस्तित्व से दूर ले जाता है।

आज का युवा
प्रेम और आशक्ति के अंतर को भूलता जा रहा है।
वह आकर्षण को समर्पण समझ बैठा है,
और क्षणिक भावनाओं के लिए
अपने कैरियर, माता-पिता, संस्कार और जीवन तक को
दाँव पर लगा रहा है।

भारतीय दर्शन प्रेम का विरोध नहीं करता,
पर वह स्पष्ट चेतावनी देता है
आसक्ति पतन का द्वार है।

प्रेम और आशक्ति का भेद : गीता की चेतावनी

श्रीमद्भगवद्गीता कहती है

“सङ्गात् संजायते कामः, कामात् क्रोधोऽभिजायते।
क्रोधाद्भवति सम्मोहः, सम्मोहात् स्मृतिविभ्रमः॥”
(गीता 2.62–63)

अर्थात
आसक्ति से कामना,
कामना से मोह,
और मोह से विवेक का नाश होता है।

आज यही विवेक-नाश
युवाओं को यह सोचने पर मजबूर कर रहा है 
“उसके बिना मैं कुछ नहीं।”

जबकि सत्य यह है
आपके बिना भी दुनिया चल सकती है,
पर आपके बिना आपके माता-पिता नहीं।

माता-पिता का प्रेम : बिना शर्त, बिना सौदे के

उपनिषद उद्घोष करते हैं

“मातृदेवो भव।
पितृदेवो भव।”

माता-पिता इसलिए देव हैं क्योंकि
उन्होंने कभी विकल्प नहीं रखा,
कभी शर्त नहीं रखी,
कभी बदले में कुछ नहीं माँगा।

वे तब भी आपके साथ थे
जब आप शून्य थे
न पहचान, न उपलब्धि, न सामर्थ्य।

और आज
यदि कोई प्रेम आपसे कहे
“परिवार छोड़ दो”,
“माता-पिता समझते नहीं”,
“मेरे लिए सब कुछ त्याग दो”
तो समझ लीजिए
वह प्रेम नहीं, संस्कारहीन आग्रह है।

प्रेम और कर्तव्य : धर्म की कसौटी

भारतीय परंपरा में
हर संबंध की परीक्षा
धर्म (कर्तव्य) से होती है।

रामचरितमानस कहता है

“धीरज धरम मित्र अरु नारी,आपद काल परखिए चारी।”

संकट में वही प्रेम टिकता है
जो
आपके लक्ष्य का सम्मान करे,
आपके माता-पिता को आदर दे,
आपके भविष्य को सुरक्षित रखे।

जो प्रेम
आपको आपके कर्तव्यों से तोड़े,
वह प्रेम नहीं
अधर्म है।

कैरियर नष्ट हुआ तो प्रेम भी बोझ बन जाता है

यह कड़वा, पर अटल सत्य है
जब पढ़ाई छूटती है,
जब नौकरी नहीं मिलती,
जब आत्मनिर्भरता नहीं होती
तब वही प्रेम आपसे प्रश्न करता है
“अब आगे क्या?”

महाभारत का सूत्र है

“न धर्मोऽर्थेन हीनस्य।”

जिसके पास आधार नहीं,
उसके लिए न धर्म टिकता है,
न संबंध

इसलिए याद रखिए
बिना आत्मनिर्भर बने प्रेम करना,
अपने ही भविष्य के साथ अन्याय है।

जीवन अमूल्य है किसी के लिए समाप्त करने योग्य नहीं

कोई प्रेम, कोई रिश्ता, कोई व्यक्ति
इतना बड़ा नहीं
कि उसके लिए आप
अपना जीवन, अपनी शिक्षा
या अपने माता-पिता की उम्मीदें खो दें।

गीता स्पष्ट आदेश देती है

“उद्धरेदात्मनाऽत्मानं,नात्मानमवसादयेत्।”
(गीता 6.5)

मनुष्य को स्वयं अपना उद्धार करना चाहिए,
खुद को गिराना नहीं।

यदि कोई प्रेम
आपको तोड़ रहा है, डरा रहा है,
या जीवन से विमुख कर रहा है
तो वह प्रेम नहीं,
मानसिक बंधन है।

सच्चे प्रेम की पहचान यह है कि

सच्चा प्रेम
आपको बेहतर मनुष्य बनाता है,
आपके कैरियर को संबल देता है,
आपके माता-पिता का सम्मान करता है,
आपके जीवन की रक्षा करता है।

जो प्रेम
इन कसौटियों पर खरा न उतरे,
उसे छोड़ देना
कायरता नहीं, बुद्धिमत्ता है।

अंतिम निवेदन (युवान/ युवतियों से)

याद रखिए
प्रेम जीवन का अंश है, लक्ष्य नहीं।
माता-पिता जीवन की जड़ हैं।
कैरियर जीवन की रीढ़ है।
और आपका जीवन अमूल्य धरोहर।

प्रेम में डूबिए जरूर,
पर
अपने अस्तित्व को मत डुबोइए।

सादर



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